समर्थक

Saturday, 26 July 2014

“सावन की ग़जल” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

savan ke jhoole
गन्दुमी सी पर्त ने ढक ही दिया आकाश नीला 
देखकर घनश्याम को होने लगा आकाश पीला 

छिप गया चन्दा गगन में, हो गया मज़बूर सूरज
 

पर्वतों की गोद में से बह गया कमजोर टीला 

बाँटती सुख सभी को बरसात की भीनी फुहारें
 

बरसता सावन सुहाना हो गया चौमास गीला 
 
 पड़ गये झूले पुराने नीम के उस पेड़ पर
पास के तालाब से मेढक सुनाते सुर-सुरीला 

इन्द्र ने अपने धनुष का 
“रूप” सुन्दर सा दिखाया 

सात रंगों से सजा है गगन में कितना सजीला
indradhanush

Friday, 11 July 2014

"गीत-अपना साया भी, बेगाना लगता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

वक्त सही हो तो सारा, संसार सुहाना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।

यदि अपने घर व्यंजन हैं, तो बाहर घी की थाली है,
भिक्षा भी मिलनी मुश्किल, यदि अपनी झोली खाली है,
गूढ़ वचन भी निर्धन का, जग को बचकाना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।

फूटी किस्मत हो तो, गम की भीड़ नजर आती है,
कालीनों को बोरों की, कब पीड़ नजर आती है,
कलियों को खिलते फूलों का रूप पुराना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।

धूप-छाँव जैसा, अच्छा और बुरा हाल आता है,
बारह मास गुजर जाने पर, नया साल आता है,
खुशियाँ घर में आयें तो, अच्छा मुस्काना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।

Tuesday, 1 July 2014

“बरसता सावन सुहाना हो गया” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

savan ke jhoole
गन्दुमी सी पर्त ने ढक ही दिया आकाश नीला 
देखकर घनश्याम को होने लगा आकाश पीला 

छिप गया चन्दा गगन में, हो गया मज़बूर सूरज
 

पर्वतों की गोद में से बह गया कमजोर टीला 

बाँटती सुख सभी को बरसात की भीनी फुहारें
 

बरसता सावन सुहाना हो गया चौमास गीला 

 पड़ गये झूले पुराने नीम के उस पेड़ पर
पास के तालाब से मेढक सुनाते सुर-सुरीला 

इन्द्र ने अपने धनुष का 
“रूप” सुन्दर सा दिखाया 

सात रंगों से सजा है गगन में कितना सजीला