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Tuesday, 14 January 2014

"मकर लग्न में सूरज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



धनु से मकर लग्न में सूरज, आज धरा पर आया।
गया शिशिर का समय और ठिठुरन का हुआ सफाया।।
गंगा जी के तट पर, अपनी खिचड़ी खूब पकाओ,
खिचड़ी खाने से पहले, निर्मल जल से तुम नहाओ,
आसमान में खुली धूप को सूरज लेकर आया।
गया शिशिर का समय और ठिठुरन का हुआ सफाया।।

स्वागत करो बसन्त ऋतु का, जीवन में रस घोलो,
तिल-चौलाई के लड्डू को खाकर मीठा बोलो,
इस अवसर पर सबके मन में है उल्लास समाया।
गया शिशिर का समय और ठिठुरन का हुआ सफाया।।
खुशियों की डोरी से नभ में अपनी पतंग उड़ाओ,
मन में भरकर जोश जीत का जमकर पेंच लड़ाओ,
झुण्ड पंछियों का नभ में, यह खेल देखने आया।
गया शिशिर का समय और ठिठुरन का हुआ सफाया।।

कुछ दिन में ध्वज फहरायेंगे, भारतभाग्यविधाता,
प्यारा सा गणतन्त्रदिवस भी इसी माह में आता,
पर्व सलोना त्यौहारों की गठरी को संग लाया।
गया शिशिर का समय और ठिठुरन का हुआ सफाया।।

Sunday, 29 December 2013

"रिश्वत का चलन मिटायें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


अपना देश महान बनायें।
आओ नूतन वर्ष मनायें।।
 
मातम भी था और हर्ष था,
मिला-जुला ही गयावर्ष था,
भूल-चूक जो हमने की थीं,
उन्हें न फिर से हम दुहरायें। 
अपना देश महान बनायें।
आओ नूतन वर्ष मनायें।।
 
कभी न हो कोई दिन काला,
सूरज-चन्दा लाये उजाला,
छँटे कुहासा-हटे हताशा,
ग़म के बादल कभी न छायें। 
अपना देश महान बनायें।
आओ नूतन वर्ष मनायें।।
 
बन्द करें सब फिकरे-ताने,
देशभक्ति के गायें तराने,
फिल्में नहीं बने अब ऐसी,
जो कामुकता-भाव जगायें। 
अपना देश महान बनायें।
आओ नूतन वर्ष मनायें।।
 
शिक्षा का व्यापार बन्द हो,
सुमनों में भरपूर गन्ध हो,
कर्णधार सत्ता के मद में,
कभी न जनता को बिसरायें। 
अपना देश महान बनायें।
 आओ नूतन वर्ष मनायें।।

चमचे-गुण्डे और मवाली,
यहाँ न खाने पाये दलाली,
उनको ही मत देना अपना,
जो रिश्वत का चलन मिटायें। 
अपना देश महान बनायें।
आओ नूतन वर्ष मनायें।।

Saturday, 21 December 2013

"सुखनवर गीत लाया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


गजल और गीत क्या है,
नहीं कोई जान पाया है।
हृदय की बात कहने को,
कलम अपना चलाया है।।

मिलन की जब घड़ी होती,
बिछुड़ जाने का गम होता,
 तभी पर्वत के सीने से,
निकलता  धार बन सोता,
उफनते भाव के नद को,
करीने से सजाया है।
हृदय की बात कहने को,
कलम अपना चलाया है।।

बिछाएँ हों किसी ने जब,
वफा की राह में काँटे,
लगीं हो दोस्ती में जब,
जफाओं की कठिन गाँठे,
दबे जज्बात कहने का,
बहाना हाथ आया है।
हृदय की बात कहने को,
कलम अपना चलाया है।।

चमन में जब कभी, वीरानगी-
दहशत सी छायी हो,
वतन में जब कभी गर्दिश 
कहर बन करके आयी हो,
बहारों को मनाने को,
सुखनवर गीत लाया है।
हृदय की बात कहने को,
कलम अपना चलाया है।।

Wednesday, 11 December 2013

"दुनियादारी जाम हो गई" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


नीलगगन पर कुहरा छाया, 
दोपहरी में शाम हो गई।
शीतलता के कारण सारी, 
दुनियादारी जाम हो गई।।

गैस जलानेवाली ग़ायब, 
लकड़ी गायब बाज़ारों से,
कैसे जलें अलाव? यही तो 
पूछ रहे हैं सरकारों से,
जीवन को ढोनेवाली अब,
 काया भी नाकाम हो गई।

खुदरा व्यापारी जायेंगे, 
परदेशी व्यापार करेंगे,
आम आदमी को लूटेंगे, 
अपनी झोली खूब भरेंगे,
दलदल में फँस गया सफीना, 
धारा तो गुमनाम हो गई।
जीवन को ढोनेवाली अब, 
काया भी नाकाम हो गई।

सस्ती हुई ज़िन्दग़ी कितनी, 
बढ़ी मौत पर मँहगाई है,
संसद में बैठे बिल्लों ने, 
दूध-मलाई ही खाई है,
शीला की लुट गई जवानी, 
मुन्नी भी बदनाम हो गई।

Monday, 2 December 2013

"जवानी गीत है अनुपम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

सुलगते प्यार में, महकी हवाएँ आने वाली हैं।
दिल-ए-बीमार को, देने दवाएँ आने वाली हैं।।

चटककर खिल गईं कलियाँ,
महक से भर गईं गलियाँ,
सुमन की सूनी घाटी में, सदाएँ आने वाली है।
दिल-ए-बीमार को, देने दवाएँ आने वाली हैं।।

चहकने लग गई कोयल,
सुहाने हो गये हैं पल,
नवेली कोपलों में, अब अदाएँ आने वाली हैं।
दिल-ए-बीमार को, देने दवाएँ आने वाली हैं।।

जवानी गीत है अनुपम,
भरे इसमें हजारों खम,
सुधा रसधार बरसाने, घटाएँ आने वाली हैं।
दिल-ए-बीमार को, देने दवाएँ आने वाली हैं।।

दिवस है प्यार करने का,
नही इज़हार करने का,
करोगे इश्क सच्चा तो, दुआएँ आने वाली हैं।
दिल-ए-बीमार को, देने दवाएँ आने वाली हैं।।

Sunday, 24 November 2013

"चम्पू काव्य-खो गयी प्राचीनता?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कौन थे? क्या थे? कहाँ हम जा रहे?
व्योम में घश्याम क्यों छाया हुआ?
भूल कर तम में पुरातन डगर को,
कण्टकों में फँस गये असहाय हो,
वास करते थे कभी यहाँ पर करोड़ो देवता,
देवताओं के नगर का नाम आर्यावर्त था,
काल बदला, देव से मानव कहाये,
ठीक था, कुछ भी नही अवसाद था,
किन्तु अब मानव से दानव बन गये,
खो गयी जाने कहाँ? प्राचीनता,
मूल्य मानव के सभी तो मिट गये,
शारदा में पंक है आया हुआ,
हे प्रभो! इस आदमी को देख लो,
लिप्त है इसमे बहुत शैतानियत,
आज परिवर्तन हुआ कैसा घना,
हो गयी है लुप्त सब इन्सानियत।

Wednesday, 20 November 2013

"ढाई आखर नही व्याकरण चाहिए" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


मोक्ष के लक्ष को मापने के लिए,
जाने कितने जनम और मरण चाहिए ।
प्यार का राग आलापने के लिए,
शुद्ध स्वर, ताल, लय, उपकरण चाहिए।।

लैला-मजनूँ को गुजरे जमाना हुआ,
किस्सा-ए हीर-रांझा पुराना हुआ,
प्रीत की पोथियाँ बाँचने के लिए-
ढाई आखर नही व्याकरण चाहिए ।
प्यार का राग आलापने के लिए,
शुद्ध स्वर, ताल, लय, उपकरण चाहिए।।

सन्त का पन्थ होता नही है सरल,
पान करती सदा मीराबाई गरल,
कृष्ण और राम को जानने के लिए-
सूर-तुलसी सा ही आचरण चाहिए ।
प्यार का राग आलापने के लिए,
शुद्ध स्वर, ताल, लय, उपकरण चाहिए।।

सच्चा प्रेमी वही जिसको लागी लगन,
अपनी परवाज में हो गया जो मगन,
कण्टकाकीर्ण पथ नापने के लिए-
शूल पर चलने वाले चरण चाहिए।।
प्यार का राग आलापने के लिए,
शुद्ध स्वर, ताल, लय, उपकरण चाहिए।।

झर गये पात हों जिनके मधुमास में,
लुटगये हो वसन जिनके विश्वास में,
स्वप्न आशा भरे देखने के लिए-
नयन में नींद का आवरण चाहिए ।।
प्यार का राग आलापने के लिए,
शुद्ध स्वर, ताल, लय, उपकरण चाहिए।।