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गरल भरा हमने गागर में।
कैसे प्यास बुझेगी मन की,
खारा जल पाया सागर में।।
कथा-कीर्तन और जागरण,
रास न आये मेरे मन को।
आपाधापी की झंझा में,
होम कर दिया इस जीवन को।
वन का पंछी डोल रहा है,
भिक्षा पाने को घर-घर में।
कैसे प्यास बुझेगी मन की,
खारा जल पाया सागर में।।
आज धरा-रानी के हमने,
लूट लिए सारे आभूषण।
नंगे पर्वत, सूखे झरने,
अट्टहास करता है दूषण।
नहीं जवानी और रवानी,
कायरता है नर-नाहर में।
कैसे प्यास बुझेगी मन की,
खारा जल पाया सागर में।।
खनन बढ़ा है, खनिज घटे हैं,
नकली मिलते आज रसायन।
हारे का हथियार बचा है,
गीता-रामायण का गायन।
कैसे ओढ़ूँ और बिछाऊँ,
सिमटा हूँ छोटी चादर में।
कैसे प्यास बुझेगी मन की,
खारा जल पाया सागर में।।
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Monday, 5 May 2014
"खारा जल पाया सागर में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
Wednesday, 23 April 2014
"इन्साफ की डगर पर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
इन्साफ की डगर पर, नेता नही चलेंगे।
होगा जहाँ मुनाफा, उस ओर जा मिलेंगे।।
दिल में घुसा हुआ है,
दल-दल दलों का जमघट।
संसद में फिल्म जैसा,
होता है खूब झंझट।
फिर रात-रात भर में, आपस में गुल खिलेंगे।
होगा जहाँ मुनाफा उस ओर जा मिलेंगे।।
गुस्सा व प्यार इनका,
केवल दिखावटी है।
और देश-प्रेम इनका,
बिल्कुल बनावटी है।
बदमाश, माफिया सब इनके ही घर पलेंगे।
होगा जहाँ मुनाफा, उस ओर जा मिलेंगे।।
खादी की केंचुली में,
रिश्वत भरा हुआ मन।
देंगे वहीं मदद ये,
होगा जहाँ कमीशन।
दिन-रात कोठियों में, घी के दिये जलेंगे।
होगा जहाँ मुनाफा, उस ओर जा मिलेंगे।।
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Friday, 18 April 2014
"ईश्वर-अल्लाह कैद हो गया आलीशान मकानों में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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चैन-ओ-अमन, सुकून खोजता, मजहब की दूकानों में।
चौकीदारों ने मालिक को, बन्धक आज बनाया है,
मिथ्या आडम्बर से, भोली जनता को भरमाया है,
धन के लिए समागम होते, सभागार-मैदानों में।
पहले लूटा था गोरों ने, अब काले भी लूट रहे,
धर्मभीरु भक्तों को, भगवाधारी जमकर लूट रहे,
क्षमा-सरलता नहीं रही, इन इन्सानी भगवानों में।
झोली भरते हैं विदेश की, हम सस्ते के चक्कर में,
टिकती नहीं विदेशी चीजें, गुणवत्ता की टक्कर में,
नैतिकता नीलाम हो रही, परदेशी सामानों में।
जितनी ऊँची दूकानें, उनमें फीके पकवान सजे,
कंकड़-पत्थर भरे कुम्भ से, कैसे सुन्दर साज बजे,
खोज रहे हैं लोग जायका, स्वादहीन पकवानों में।
गंगा सूखी, यमुना सूखी, सरस सुमन भी सूख चले,
ज्ञानभास्कर लुप्त हो गया, तम का वातावरण पले,
ईश्वर-अल्लाह कैद हो गया, आलीशान मकानों में।।
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Thursday, 13 February 2014
"बाँटता ठण्डक सभी को चन्द्रमा सा रूप मेरा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
बाँटता ठण्डक सभी को, चन्द्रमा सा रूप मेरा।
तारकों ने पास मेरे, बुन लिया घेरा-घनेरा।।
रश्मियों से प्रेमियों को मैं बुलाता,
चाँदनी से मैं दिलों को हूँ लुभाता,
दीप सा बनकर हमेशा, रात का हरता अन्धेरा।
तारकों ने पास मेरे, बुन लिया घेरा-घनेरा।।
मैं मुसाफिर हूँ-विहग हूँ रात का,
संयोग हूँ-खग हूँ, सुहाने साथ का,
भोर होने पर विदा होकर, बुलाता हूँ सवेरा।
तारकों ने पास मेरे, बुन लिया घेरा-घनेरा।।
बालपन, यौवन-बुढ़ापे को बताता,
हर अमावस को सदा परलोक जाता,
चार दिन की चाँदनी के बाद, लुट जाता बसेरा।
तारकों ने पास मेरे, बुन लिया घेरा-घनेरा।।
रोज ही मैं “रूप” को अपने बदलता,
उम्र को अपनी कला से, नित्य छलता,
लील लेता वक्त, कितना भी रहे मजबूत डेरा।
तारकों ने पास मेरे, बुन लिया घेरा-घनेरा।।
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Tuesday, 14 January 2014
"मकर लग्न में सूरज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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गया शिशिर का समय और ठिठुरन का हुआ सफाया।।
गंगा जी के तट पर, अपनी खिचड़ी खूब पकाओ,
खिचड़ी खाने से पहले, निर्मल जल से तुम नहाओ,
आसमान में खुली धूप को सूरज लेकर आया।
गया शिशिर का समय और ठिठुरन का हुआ सफाया।।
स्वागत करो बसन्त ऋतु का, जीवन में रस घोलो,
तिल-चौलाई के लड्डू को खाकर मीठा बोलो,
इस अवसर पर सबके मन में है उल्लास समाया।
गया शिशिर का समय और ठिठुरन का हुआ सफाया।।
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खुशियों की डोरी से नभ में अपनी पतंग उड़ाओ,
मन में भरकर जोश जीत का जमकर पेंच लड़ाओ,
झुण्ड पंछियों का नभ में, यह खेल देखने आया।
गया शिशिर का समय और ठिठुरन का हुआ सफाया।।
कुछ दिन में ध्वज फहरायेंगे, भारतभाग्यविधाता,
प्यारा सा गणतन्त्रदिवस भी इसी माह में आता,
पर्व सलोना त्यौहारों की गठरी को संग लाया।
गया शिशिर का समय और ठिठुरन का हुआ सफाया।।
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Sunday, 29 December 2013
"रिश्वत का चलन मिटायें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
Saturday, 21 December 2013
"सुखनवर गीत लाया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गजल और गीत क्या है,
कलम अपना चलाया है।।
कलम अपना चलाया है।।
दहशत सी छायी हो,
कहर बन करके आयी हो,
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