समर्थक

Saturday, 29 November 2014

"नमन शैतान करते है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मधुर पर्यावरण जिसने, बनाया और निखारा है,
हमारा आवरण जिसने, सजाया और सँवारा है।
बहुत आभार है उसका, बहुत उपकार है उसका,
दिया माटी के पुतले को, उसी ने प्राण प्यारा है।।

बहाई ज्ञान की गंगा, मधुरता ईख में कर दी,
कभी गर्मी, कभी वर्षा, कभी कम्पन भरी सरदी।
किया है रात को रोशन, दिये हैं चाँद और तारे,
अमावस को मिटाने को, दियों में रोशनी भर दी।।
मधुर पर्यावरण जिसने, बनाया और निखारा है,
हमारा आवरण जिसने, सजाया और सँवारा है।।

लगा जब रोग का सदमा, तो उसने ही दवा दी है,
कुहासे को मिटाने को, उसी ने तो हवा दी है।
जो रहते जंगलों में, भीगते बारिश के पानी में,
उन्ही के वास्ते झाड़ी मे कुटिया सी छवा दी है।।
मधुर पर्यावरण जिसने, बनाया और निखारा है,
हमारा आवरण जिसने, सजाया और सँवारा है।।

सुबह और शाम को मच्छर, सदा गुणगान करते हैं,
जगत के उस नियन्ता को, सदा प्रणाम करते हैं।
मगर इन्सान है खुदगर्ज कितना आज के युग में ,
विपत्ति जब सताती है, नमन शैतान करते है।।
मधुर पर्यावरण जिसने, बनाया और निखारा है,
हमारा आवरण जिसने, सजाया और सँवारा है।।

Wednesday, 29 October 2014

"जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जो हैं कोमल-सरल उनको मेरा नमन।
जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।।

पेड़ अभिमान में थे अकड़ कर खड़े, 
एक झोंके में वो धम्म से गिर पड़े, 
लोच वालो का होता नही है दमन।
जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।।

सख्त चट्टान पल में दरकने लगी, 
जल की धारा के संग में लुढ़कने लगी, 
छोड़ देना पड़ा कंकड़ों को वतन।
जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।।

घास कोमल है लहरा रही शान से, 
सबको देती सलामी बड़े मान से, 
आँधी तूफान में भी सलामत है तन।
जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।।

Tuesday, 30 September 2014

"गीत-हमको याद दिलाते हैं” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जब भी सुखद-सलोने सपने,  नयनों में छा आते हैं।
गाँवों के निश्छल जीवन की, हमको याद दिलाते हैं।

सूरज उगने से पहले, हम लोग रोज उठ जाते थे,
दिनचर्या पूरी करके हम, खेत जोतने जाते थे,
हरे चने और मूँगफली के, होले मन भरमाते हैं।
गाँवों के निश्छल जीवन की, हमको याद दिलाते हैं।।

मट्ठा-गुड़ नौ बजते ही, दादी खेतों में लाती थी,
लाड़-प्यार के साथ हमें, वह प्रातराश करवाती थी,
मक्की की रोटी, सरसों का साग याद आते हैं।
गाँवों के निश्छल जीवन की, हमको याद दिलाते हैं।।

आँगन में था पेड़ नीम का, शीतल छाया देता था,
हाँडी में का कढ़ा-दूध, ताकत तन में भर देता था,
खो-खो और कबड्डी-कुश्ती, अब तक मन भरमाते हैं।
गाँवों के निश्छल जीवन की, हमको याद दिलाते हैं।।

तख्ती-बुधका और कलम, बस्ते काँधे पे सजते थे,
मन्दिर में ढोलक-बाजा, खड़ताल-मँजीरे बजते थे,
हरे सिंघाड़ों का अब तक, हम स्वाद भूल नही पाते हैं।
गाँवों के निश्छल जीवन की, हमको याद दिलाते हैं।।

युग बदला, पहनावा बदला, बदल गये सब चाल-चलन,
बोली बदली, भाषा बदली, बदल गये अब घर आंगन,
दिन चढ़ने पर नींद खुली, जल्दी दफ्तर को जाते हैं।
गाँवों के निश्छल जीवन की, हमको याद दिलाते हैं।।

Saturday, 20 September 2014

"गजल और गीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


गजल और गीत क्या है,
नहीं कोई जान पाया है।
हृदय की बात कहने को,
कलम अपना चलाया है।।

मिलन की जब घड़ी होती,
बिछुड़ जाने का गम होता,
 तभी पर्वत के सीने से,
निकलता  धार बन सोता,
उफनते भाव के नद को,
करीने से सजाया है।
हृदय की बात कहने को,
कलम अपना चलाया है।।

बिछाएँ हों किसी ने जब,
वफा की राह में काँटे,
लगीं हो दोस्ती में जब,
जफाओं की कठिन गाँठे,
दबे जज्बात कहने का,
बहाना हाथ आया है।
हृदय की बात कहने को,
कलम अपना चलाया है।।

चमन में जब कभी,
वीरानगी-दहशत सी छायी हो,
वतन में जब कभी,
गर्दिश कहर बन करके आयी हो,
बहारों को मनाने को,
सुखनवर गीत लाया है।
हृदय की बात कहने को,
कलम अपना चलाया है।।

Saturday, 26 July 2014

“सावन की ग़जल” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

savan ke jhoole
गन्दुमी सी पर्त ने ढक ही दिया आकाश नीला 
देखकर घनश्याम को होने लगा आकाश पीला 

छिप गया चन्दा गगन में, हो गया मज़बूर सूरज
 

पर्वतों की गोद में से बह गया कमजोर टीला 

बाँटती सुख सभी को बरसात की भीनी फुहारें
 

बरसता सावन सुहाना हो गया चौमास गीला 
 
 पड़ गये झूले पुराने नीम के उस पेड़ पर
पास के तालाब से मेढक सुनाते सुर-सुरीला 

इन्द्र ने अपने धनुष का 
“रूप” सुन्दर सा दिखाया 

सात रंगों से सजा है गगन में कितना सजीला
indradhanush

Friday, 11 July 2014

"गीत-अपना साया भी, बेगाना लगता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

वक्त सही हो तो सारा, संसार सुहाना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।

यदि अपने घर व्यंजन हैं, तो बाहर घी की थाली है,
भिक्षा भी मिलनी मुश्किल, यदि अपनी झोली खाली है,
गूढ़ वचन भी निर्धन का, जग को बचकाना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।

फूटी किस्मत हो तो, गम की भीड़ नजर आती है,
कालीनों को बोरों की, कब पीड़ नजर आती है,
कलियों को खिलते फूलों का रूप पुराना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।

धूप-छाँव जैसा, अच्छा और बुरा हाल आता है,
बारह मास गुजर जाने पर, नया साल आता है,
खुशियाँ घर में आयें तो, अच्छा मुस्काना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।

Tuesday, 1 July 2014

“बरसता सावन सुहाना हो गया” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

savan ke jhoole
गन्दुमी सी पर्त ने ढक ही दिया आकाश नीला 
देखकर घनश्याम को होने लगा आकाश पीला 

छिप गया चन्दा गगन में, हो गया मज़बूर सूरज
 

पर्वतों की गोद में से बह गया कमजोर टीला 

बाँटती सुख सभी को बरसात की भीनी फुहारें
 

बरसता सावन सुहाना हो गया चौमास गीला 

 पड़ गये झूले पुराने नीम के उस पेड़ पर
पास के तालाब से मेढक सुनाते सुर-सुरीला 

इन्द्र ने अपने धनुष का 
“रूप” सुन्दर सा दिखाया 

सात रंगों से सजा है गगन में कितना सजीला