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Saturday, 30 May 2015

"कलम के मुसाफिर कहीं सो न जाना!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


चमक और दमक में, कहीं खो न जाना!
कलम के मुसाफिर, कहीं सो न  जाना!

जलाना पड़ेगा तुझे, दीप जगमग, 
दिखाना पड़ेगा जगत को सही मग, 
तुझे सभ्यता की, अलख है जगाना!! 
कलम के मुसाफिर, कहीं सो न  जाना!

सिक्कों की खातिर कलम बेचना मत,
कलम में छिपी है ज़माने की ताकत,
भटके हुओं को सही पथ दिखाना!
कलम के मुसाफिर, कहीं सो न  जाना!

झूठों की करना कभी मत हिमायत,
अमानत में करना कभी मत ख़यानत,
हकीकत से अपना न दामन बचाना!
कलम के मुसाफिर, कहीं सो न  जाना!

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