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Friday, 11 July 2014

"गीत-अपना साया भी, बेगाना लगता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

वक्त सही हो तो सारासंसार सुहाना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भीबेगाना लगता है।।

यदि अपने घर व्यंजन हैंतो बाहर घी की थाली है,
भिक्षा भी मिलनी मुश्किलयदि अपनी झोली खाली है,
गूढ़ वचन भी निर्धन काजग को बचकाना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भीबेगाना लगता है।।

फूटी किस्मत हो तोगम की भीड़ नजर आती है,
कालीनों को बोरों कीकब पीड़ नजर आती है,
कलियों को खिलते फूलों का रूप पुराना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भीबेगाना लगता है।।

धूप-छाँव जैसाअच्छा और बुरा हाल आता है,
बारह मास गुजर जाने परनया साल आता है,
खुशियाँ घर में आयें तो, अच्छा मुस्काना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भीबेगाना लगता है।।

2 comments:

  1. Sahi kaha aapne bure waqt me kuch nhi bhata...saaz shringaar...boli baat kuch nhi... Vastvikta ko prastut karti rachna...!

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