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Monday, 5 May 2014

"खारा जल पाया सागर में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


अमृत रास न आया हमको,
गरल भरा हमने गागर में।
कैसे प्यास बुझेगी मन की,
खारा जल पाया सागर में।।

कथा-कीर्तन और जागरण,
रास न आये मेरे मन को।
आपाधापी की झंझा में,
होम कर दिया इस जीवन को।
वन का पंछी डोल रहा है,
भिक्षा पाने को घर-घर में।
कैसे प्यास बुझेगी मन की,
खारा जल पाया सागर में।।

आज धरा-रानी के हमने,
लूट लिए सारे आभूषण।
नंगे पर्वत, सूखे झरने,
अट्टहास करता है दूषण।
नहीं जवानी और रवानी,
कायरता है नर-नाहर में।
कैसे प्यास बुझेगी मन की,
खारा जल पाया सागर में।।

खनन बढ़ा है, खनिज घटे हैं,
नकली मिलते आज रसायन।
हारे का हथियार बचा है,
गीता-रामायण का गायन।
कैसे ओढ़ूँ और बिछाऊँ,
सिमटा हूँ छोटी चादर में।
कैसे प्यास बुझेगी मन की,
खारा जल पाया सागर में।।

2 comments:

  1. सुंदर ,प्रासंगिक एवं मार्मिक कविता ।

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